थांरौ साथो घणो सुहावै सा…

11.11.11

थे याद मोकळा आवो

प्रीत-ओळ्यूंड़ी
थे याद मोकळा आवो
नित-नित काळजियो हुमकावो सा !
जोबन री दियाळी सूं होळी
हिवड़ै म्हारै मंगळावो सा !!

थे छांनै-छांनै आय हौळै सूं मन रौ बारणो खटकावो !
म्हैं निजरां रै गोखै सूं झांकूं, जद कैंयां छिप जावो ?
बीजळड़ी ज्यूं लुक-छिप रमता
मनड़ै नैं क्यूं संतावो सा ?
थे याद मोकळा आवो

काळजियो सिळगै जेठ-अषाढ़ ज्यूं, नैणां बसग्यो चौमासो !
पो-माघ-पून ज्यूं आस मिलण री, हिवड़ै पतझड़-वासो !
थे फागणियै तरसावो क्यूं
सावणियै क्यूं सिळगावो सा ?
थे याद मोकळा आवो

म्हारै मनड़ै रै समदर में प्रीत-ओळ्यूंड़ी लेवै हबोळा !
ज्यूं चांदी-निपज्यै खेत में सोन चिड़कल्यां करै कलोळां !
बिन बरसी बादळी ज्यूं मत जावो
नैणां नेह सरसावो सा !
थे याद मोकळा आवो
- राजेन्द्र स्वर्णकार
©copyright by : Rajendra Swarnkar

 भावार्थ
 बहुत याद आते हैं आप !

आप मुझे बहुत अधिक याद आते हैं ।
हमेशा मेरे कलेजे में हूक-हिलोरें जाग्रत करते रहते हैं ।
यौवन की दीवाली से हृदय में होली जलाते रहते हैं ।

आप चुपके-चुपके आ'कर मन का द्वार खटखटाते हैं । मैं नज़रों के झरोखे से झांकता/झांकती हूं तब छुप कैसे जाते हैं ? बिजली की तरह लुका-छुपी खेलते हुए आप मेरे मन को क्यों सताते हैं ?

मेरा कलेजा जेठ-आषाड़ की तरह सुलगता रहता है । आंखों में जैसे चौमासा बस गया है । आप मुझे फागुन में भी क्यों तरसाते हैं ? सावन में भी क्यों सुलगाते हैं ?

मेरे हृदय-सागर में प्रणय-स्मृतियां हिलोरे लेती रहती हैं ,
मानो भरपूर तैयार फसल वाले खेत में सोन चिरैयाएं किलोल कर रही हों । आप बिना बरसी हुई बदली की भांति चले मत जाइए ,
आंखों से प्रेम का सरस प्रदर्शन-आभास होने दें
बहुत याद आते हैं आप !

मित्रों ! रचना के भावों की आत्मा को सृजित रचना की भाषा को जान कर ही हूबहू पहचाना और अनुभव किया जा सकता है । फिर भी अपने पाठकों का बहुत मान करने के कारण मैं अक्सर अतिरिक्त श्रम करते हुए भावार्थ/शब्दार्थ लिखता रहता हूं  ताकि मेरे लिखे राजस्थानी गीत-ग़ज़लों-दोहों में मेरे रचनाकार को मिलने वाले सरस्वती के प्रसाद को आपके साथ न केवल बांट सकूं ,  वरन् राजस्थानी भाषा की सामर्थ्य से भी आपको साथ ही साथ परिचित करवा सकूं । )
मेरे हिंदी ब्लॉग पर दोहों के साथ ग़ज़ल सुनना न भूलें

12 टिप्‍पणियां:

Rajendra Swarnkar : राजेन्द्र स्वर्णकार ने कहा…


ओळ्यूं मरुधर देश री
रा सगळा साथीड़ां नैं ११ ११ ११ ११ ११ ११ रै अद्वितीय संजोग री

हियतळ सूं बधाई और मंगळकामनावां !
- राजेन्द्र स्वर्णकार

Brijendra Singh... (बिरजू, برجو) ने कहा…

मै भारतीय लोक भाषाई रचनाओं और संगीत का बहुत बड़ा प्रशंसक हूँ..खुद भी ब्रिज भाषा मै लिखने का प्रयास करता हूँ..आपका ये राजस्थानी रत्नों से जड़ा सुंदर ब्लॉग पसंद आया..

साभार-
ब्रिजेन्द्र सिंह

amrendra "amar" ने कहा…

Rajasthani to nahi ha hindi me samj aa gya .bahut hi umda rachna hai aapki ............
aabhar

अरुण कुमार निगम (mitanigoth2.blogspot.com) ने कहा…

मौसम के प्रतीकों में मन की अभिव्यक्ति , प्रकृति की महक ,सोन चिरैय्या की किलोल वाह !!! आनंदित कर गया गीत.

Mamta Bajpai ने कहा…

वाह राजेंद्र जी राजस्थानी भाषा में
आपकी कविता पढ़ कर ...गाँव की सोंधी
मिटटी की महक सा अहसास हुआ ..बहुत अच्छा
मेरे ब्लॉग पर आने के लिए सुक्रिया ..आपका लिखा दोहा ही अच्छा लगा

Mamta Bajpai ने कहा…

वाह राजेन्द्र जी बहुत अच्छा

प्रेम सरोवर ने कहा…

आपके पोस्ट पर आना सार्थक सिद्ध हुआ । । मेरे पोस्ट पर आप आमंत्रित हैं । धन्यवाद ।

dheerendra ने कहा…

बहुत सुंदर रचना राजेंद्र जी बहुत खूब आभार...
मेरी नई पोस्ट में स्वागत है

Ashok Kumar ने कहा…

हिवडे री हूक रो उजास; अर मन री बांथ घाल दीन्ही है!

Rajput ने कहा…

होले से मनरो बारणो खटकाओ ..... बहुत सुन्दर रचना , मुझे राजस्थानी कम समझ आती है
मगर आपकी कविता के इशारों की भाषा में समझ गया |

Ashok Kumar ने कहा…

म्हाने पीया मिलण री आस !

अमि'अज़ीम' ने कहा…

नायाब .......